ग्राम- बुलाँकी
जिला -रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा -कविता (मुक्तक छंद)
विषय -दार्शनिक
शीर्षक-परम् ब्रह्म(सत्य)
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दार्शनिक अर्थात दर्शन करने वाला ,दर्शन अर्थात समझ (ज्ञान)
ज्ञान को समझने वाला=दार्शनिक
समझने की वस्तु- ब्रह्म(सत्य)
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*परम् ब्रह्म*
हे !परम ब्रह्म निराकार,
तेरी महिमा अपरंपार।
तू क्रिया शून्य ,तू है ज्ञान,
तू है चेतना ,तू है वर्तमान।
तू अनंत है ,तू है अनादि,
तू अखंड ,तू पारगामी।
तू नित्यानंद ,तू परमानंद ,
तू है सत्ता ,तू है ब्रह्मानंद।
तू है ईश्वर ,तू परमेश्वर,
तू अंतर्यामी, तू जगदीश्वर।
तू महावकाश ,तू ही प्रकाश ,
तू नित्य प्रभावी, तू है वर्तमान।
तेरा ऐश्वर्या ,फैला है जग सारा,
कोई नहीं है ,तुझ से न्यारा।
आह!प्रकृति तेरी कृति,
विभिन्न रूपों में तू है रचि।
नित्य वर्तमान, तेरा प्रगटन।
न तेरा आदि, न तेरा अंत।
व्यवस्था में सजी है ,नित्य वर्तमान,
निश्चित रूप में है ,तेरा आचरण।
आह !प्रकृति, कमनीय रमणिय,
तेरे बिना न किसी का अस्तित्व।
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व्याख्या:- इस कविता में परम ब्रह्मा की महिमा को विभिन्न स्वरूपों में समझाने का प्रयास किया गया है। दर्शन अर्थात समझना सत्य एवं परम ब्रह्मा को समझना है दर्शन है और समझने वाला दार्शनिक अर्थात दर्शन करने वाला ,सत्य का दर्शन करने वाला।
उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़
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