जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विषय - दार्शनिक
शीर्षक - " जिंदगी की दार्शनिकता "
विधा - छंदमुक्त कविता
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जिंदगी एक लंबी सफर है।
कहाँ तक जाना, न कुछ खबर है।
उम्मीद न रख तू किसी से,
दुनिया सिर्फ मतलबों का शहर है।
अकेला राहगीर तू ही, तेरी मंजिल का,
परछाई बस तेरा हमसफर है।
जिंदगी जीना कोई आसान काम नहीं,
कभी अमृत का प्याला, कभी सांपों का जहर है।
माना मुश्किलें है बहुत इस राह में,
चट्टानों को तरासती, नदी की एक लहर है।
जख्म-ए-निशान दिलों के भरते ही नहीं,
दर्द की खलिहान को सींचती, एक नहर है।
पत्थर भी पारस बन जाता सानिध्य में,
बस संगति-संगति का असर है।
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मौलिक रचना (स्वरचित)
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)
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