जिला :- महासमुन्द
विषय :- शांति /अहिंसा/ महात्मा गांधी
शीर्षक :- शांति व अहिंसा
विधा :- छंद मुक्त कविता
अलंकार :- कारणमाला अलंकार
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हे जोगी! सुनो जरा तुम,
गर चाहो जग में शांति।
अहिंसा है शांति की प्रणेता,
भली नहीं हैं क्रांति।
बापू जी ने दिया संदेशा,
कलह से जगती क्रांति।
क्रांति से मिलेगी शांति,
है यह मनु मन की भ्रांति।
चाटा खा लेना गाल पर,
कदापि नहीं है कायरता।
शांत भाव से मिटते हैं बैर,
है शांति मानव की सुंदरता।
सविनय ही बात रखो तुम,
क्रोध से घटती सकल ऊर्जा।
ज्यों तपिश से यंत्रों की,
क्षय हो जाता कलपुर्जा।
सत्य मिले है अहिंसा से,
अहिंसा से मिले शांति।
शांत हृदय के मानव मुख में,
सदा झलकती कांति।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने कहा है कि शांति व अहिंसा एक दूसरे के पूरक हैं साथ ही सत्य के लिए हमे सविनय आग्रह करना आवश्यक है। गांधी जी ने भी हमे यही मार्ग प्रशस्त किया है।
काव्य अलंकरण के लिए रचनाकार ने कारणमाला अलंकार के प्रयोग का प्रयास किया है।
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