स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- मुक्त
शीर्षक- अहिंसा
पढ़ा है किताबों में,कविताओं में
महापुरुषों के अनमोल वचन में,
आदर्शवादी बातें भी सुनी नेताओं के भाषण में ,
आपसी भाई-चारे का ज्ञान भी दिया पूर्वजों नें,
मगर स्वयं लड़ते रहे भाई-भाई,
जमीन के एक टुकड़े के वास्ते
करते रहे प्रहार अपनी वाणी से
बदल गये स्वार्थ में सबके रास्ते ।
मन को सुकून देती है बातें प्रेम सौहार्द की,
पर देखा है विश्व के हर कोने हिंसा ही,
छोटे से गाँव में,गली-मोहल्ले हर परिवार में ।
कुछ कमजोर हैं तो,कुछ बलवान,
भगवान की सृष्टि भी कहाँ एक समान ।
फिर जहाँ असमानता,वहाँ आती कटुता,
आपसी मनमुटाव से खत्म होती मानवता,
मन की विकृति से ही,अहिंसा हिंसा में बदलता,
फिर भ्रष्टाचार से खूब फलता
-फूलता ।
रह जाती धरी की धरी ये आदर्शवादी कहावतें ,
विश्व अहिंसा की बातें लगती खोखली,
खेल रहे हैं दुश्मन खून की होली,
सीमा पर रोज बरस रही गोली,
किसने अपनाया सत्य और मीठी बोली,
कटु वचन से मन हो रहा छलनी ।
हिंसा के विरोध में भी हिंसा ही होती,
अपराधी को बचाने कर रहे गंदी राजनीति,
पीड़ित से सहानुभूति भी बना एक दिखावा,
जाति की आड़ लेकर मचा रहे दंगा,
आपसी फूट डालने फिर हो रहा षड्यंत्र,
फिर भी अहिंसा का राग अलापता शासन तंत्र ।।
अनुरमा शुक्ला
दुर्ग (छ.ग.)
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