Saturday, October 10, 2020

अनुरमा शुक्ला की रचना- कबाड़ी का जीवन

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान - दुर्ग छ.ग.
विधा - मुक्त
शीर्षक,-
*कबाड़ी का जीवन*

क्या होता है कबाड़,सोचने की है बात ?
जिसका कोई उपयोग ना हो ?
सामान हो या रिश्ते एक दिन हो जातें हैं कबाड़,
शायद बुढ़ापे का कबाड़ी होता है वृद्धाश्रम,
जहाँ लोग स्वयं छोड़ जाते हैं अपने अनुपयोगी रिश्ते,
कभी-कभी नवजात शिशु जिसका कबाड़ी अनाथालय होता  है।

बात चीज़ों की है , हमारे लिये जो  कबाड़ ,कबाड़ी के लिये जुगाड़ ,
ये कबाड़ ही है उनके जीवन  आधार।

छुपी होती है कितनी पुरानी यादें इन रद्दी कागजों में, जो
याद दिलाते हैं हमारे संघर्ष के दिनों की,
कुछ अनकही सी बातें जो कागजों तक रह गये सीमित ।

ले जाते हैं ये कबाड़ी सबकुछ समेटकर सहेजकर,
और तलाश लेते हैं इनमें अपनी जीवन की संभावनाएं ।

गर्मी हो, तेज बारिश हो या ठिठुरन भरी  ठंडी,
रुकता नहीं  कभी इनका काम,
 और
घर के कचरे  के भी ले लेते हैं
हम इनसे अच्छे दाम,
इतनी मेहनत का मेहनताना
क्या मिलता होगा?
मालिक रखकर सारे कबाड़ 
दो पैसे ही तो दे देता होगा ।

फिर नये रुप में नये कलेकर में सजधजकर इस कबाड़ का जीवन सँवर जाता है,
लेकिन ये राजू,छोटू तो गली-गली घूमकर आवाज लगाते रह जातें हैं--रद्दी कागज,लोहा टीना ,कबाड....



                   अनुरमा शुक्ला
                    दुर्ग(छ.ग.)

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