Monday, October 5, 2020

नलिनी बाजपेयी की रचना- प्रकृति

रचनाकारा-नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, जिला-कांकेर, (छ .ग.)
   शीर्षक-प्रकृति का दिव्य सौन्दर्य
   
       *प्रकृति का दिव्य सौंदर्य*

सुरमई तिमिर 
         को दूर करने
जग में फैली प्रत्युष
          मनोहर लाली,

सबके मन को भाया, 
       जग में फैली उजियारी,
*प्रकृति का दिव्य सौंदर्य* 
       को देख मैं हुई बलिहारी।

चिड़ियों की चहक,
       मुर्गे की कुकडक ने आदित्य का द्वार खटखटाया,
       गवाक्ष से लगे झाँकने 
 तरु मनोहर,किरणों
          का मन मंडराया।

नभ में रवि किरणों 
       ने बिखेरी सुनहरी आभा,
मन्द-मन्द मुस्कुराते 
        फूल खिलकर हर्ष 
मनाते साँझा।

नव सूर्य की नव
       रश्मियों से जग हर्षाया।,
नव जीवन की आस
       सब तुझमें है समाया।

गगन चुम्बी विटपों 
      ने घेरा सूरज का आवास,
प्रखर किरणों से वह भी 
      धरा को बनाने लगा खास।
*व्याख्या*-प्रस्तुत कविता में प्रकृति के दिव्य सौंदर्य का वर्णन किया गया है। चिड़ियों की चहक,मुर्गे की कुकडक,सूर्य किरणों के सौंदर्य का वर्णन किया गया है।
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     नलिनी बाजपेयी
 संबलपुर,कांकेर,(छ .ग.)

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