रायगढ़,छत्तीसगढ़
विधा-मुक्तक
शीर्षक-प्रेरणा
दरख्तों के साये तले बैठकर
सोचती हूँ मैं अक्सर
मेरे कौन ही तुम?
जब आये तुम मेरे जीवन में
कितना मधुर था वो अवसर
तुम्हारे कदमों की वो हल्की सी आहट
और मुखड़े में फ़ैली मुस्कुराहट
जीवन मे नए सुर-ताल भर देते थे
पर अक्सर दिख जाते थे मुझे
तुम्हारे भावपूर्ण आंखों की नमी
बहने को तत्पर गर्म आसुओं की धार को
जाने कब से तुम पलकों पे रोके रखते थे
और मैं तुम्हारे अव्यक्त भावनाओं के मर्म को
समझने की नाकाम कोशिश करती थी
लगता था मेरा ही रूप है तुममे
पर तुम हकीकत के जितने करीब हो
मैं सपनो के उतने ही पास
सोचती हूँ मैं अक्सर
मेरे कौन हो तुम?
दोस्त या उससे भी बढ़कर
मेरे जीवन की प्रेरणा...........
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