पेंडरवानी , बालोद, छत्तीसगढ़
विधा - आलेख
विषय - छत्तीसगढ़ी का गद्य एक परिचय
छत्तीसगढ़ी का गद्य
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किसी भी बोली में साहित्य रचना अनायास ही प्रारंभ नही हो जाता । जब बोली कि जनमानस में व्यापकता बढ़ती है। उस बोली विशेष के प्रति लगाव रखने वाले लोगों का शैक्षिक स्तर उठता है तथा उन व्यक्तियों द्वारा अपनी मातृ बोली को भाषायी पहचान दिलाने का जूनून सवार होती है तो बोली का साहित्यिक विकास आगे बढ़ता है। भारत के अन्य बोलियों की भांति ही छत्तीसगढ़ी का मौखिक गद्य-पद्य संसार लोक कथा , लोकगीत आदि के रूप में क्षेत्रीयता के आधार पर शुरू से ही समृद्ध रहा है।छत्तीसगढ़ी साहित्य या लोक विधाओं को 1950 ई . के पश्चात संरक्षण प्राप्त हुआ।हालांकि छत्तीसगढ़ी साहित्यकार हिंदी में अपनी छाप छोड़ चुके थे।वे साथ ही साथ छत्तीसगढ़ी साहित्य रच रहे थे।
छत्तीसगढ़ी गद्य साहित्य में हीरू के कहिनी पंडित वंशीधर शर्मा ,चंदा अमृत बरसाइस लखन लाल गुप्त ,कुल के मरजाद केयूर भूषण, आवा उपन्यास परदेसी राम वर्मा आदि का महत्वपूर्ण योगदान है। आजादी के बाद छत्तीसगढ़ी गद्य साहित्य चहुमुखी विकास हुआ जिसमें डॉ.पालेश्वर शर्मा, नारायण लाल परमार ,पंडित श्याम लाल चतुर्वेदी , नंदकिशोर तिवारी ,डॉ. खूबचंद बघेल जैसे मंझे हुए साहित्यकारों ने नाटक, उपन्यास, कहानी इत्यादि विधाओं में उल्लेखनीय योगदान दिए।
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पश्चात छत्तीसगढ़ी साहित्य लेखन में और तेजी स्वाभाविक रूप से दिखाई पड़ता है।छत्तीसगढ़ी साहित्य का प्रसार , जनमानस द्वारा राजकीय कार्यो में छत्तीसगढ़ी बोली को प्रयोग करने की मांग व इसके प्रति मतातुल्य आत्मीय लगाव के चलते छत्तीसगढ़ सरकार ने छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा प्रदान कर दिया है। वर्तमान समय में डॉ. उर्मिला शुक्ल , डॉ. राजेन्द्र सोनी के लघुकथा संग्रह खोरबाहरा तोला गांधी बनाबो , रामनाथ साहू के उपन्यास कका के घर ,माटी के बरतन व नाटक जागे - जागे सुतिहा गो ,आदि महत्वपूर्ण है। वर्तमान में बहुत से युवा साहित्यकार छत्तीसगढ़ के 'ए मयारू भाखा ' के प्रति अपना कृतज्ञता प्रदर्शित करते हुए अनुभवी साहित्यकारों के साथ इसे नित प्रति समृद्ध कर रहें हैं।
- - शैलेन्द्र चेलक - -
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