रचनाकारा-नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, जिला-कांकेर, (छ. ग.)
विषय-जलप्रपात
दिनाँक-15.10.20
जलप्रपात
गिरि, गह्वर,मैदानों में
हरियाली चूनर ओढ़े
धरा ने शृंगार किए,
वन-वन,वल्लरी झूमे,
पात-पात में वर्षा की फुहार लिए।
कभी इठलाती,बलखाती
पहाड़ों से उतरती
निर्झरिणी बहार लिए,
रजत चाँदनी का धवल रूप लिए पहाड़ों से उतरती
जलप्रपात मुस्कान लिए।
पहाड़ों की गोदी से उतरता
निर्जन घाट को जुबान दिए,
सात सुरों की संगीत,
पत्थरों में अद्भुत उचार किए।
काट पहाड़ों का वक्षस्थ बह
रहे झरना का स्वरूप लिए,
बस निरन्तर आगे बढ़ते,
दृढ़ संकल्प,कठोर लक्ष्य लिए।
चंचल,कल-कल ,छल-छल,
श्वेत झाग का गान लिए,
गिरि के तरु,विटपों,लतिका,
पर्णो से होकर धरा को
नव जीवन दान दिए।
देख नवल रूप प्रकृति
का मन हर्षित हुआ
अनुपम राग लिए।
ऊँचे पहाड़ों से बलखाती धरा पर उतरी जलप्रपात नाम लिए।
व्याख्या-प्रस्तुत कविता में जलप्रपात के उद्गम से लेकर धरा पर सौंदर्य बिखेरने का वर्णन किया गया है।
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नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर, (छ .ग.)
Thursday, October 15, 2020
कांकेर से नलिनी बाजपेयी की रचना- जलप्रपात
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