Thursday, October 15, 2020

रायपुर से देविका की रचना- रेत की घड़ी

देविका
जिला रायपुर, छत्तीसगढ़
कविता का शीर्षक -" रेत की घड़ी "

रेत की घड़ी सी है ज़िन्दगी,
वक़्त के साथ फिसलती ही जाती है |
सिर्फ दिखता है सब पीछे छूटते हुए,
कांच की बोतल में बंद सी है ज़िन्दगी |
सब रिश्ते छूट रहें हैं पीछे,
नए रिश्तों की आड़ में,
नानी की परियों की कहानी,
बहुत याद आती हैं वो गालियाँ पुरानी,
नाना का वो भरपूर दुलार,
माँ की रोक - टोक,
पिता की फ़िक्र भरी फटकार |
काश फिर से उस छाव में फ़िक्र के बादल छँट जाएं,
काश भाई-बहनों की किलकारियों में हम फिर गुम हो जाएं,
सपनों ने हाथ खींचकर ये कहाँ खड़ा कर दिया,
खुद की पहचान बनाने की लालच में सब कुछ बदल गया |
अब सिर्फ कट रही हैं ज़िन्दगी,
बोझिल सा सफर बनकर |
सब कुछ छिन गया सब कुछ पा कर,
काश कुछ रेत सहेज ली होती सपनों की गठरी में,
काश फिर से खोई हुई हँसी मिल जाती मेरे शहर की गलियों में |


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