जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-दार्शनिक
विधा-कविता (मुक्त छंद)
उसकी संवेदना,कोमल मन,
फूलों की खुशबू -सा एहसास
भावनाओं की अभिव्यक्ति में
लोरी का मधुर ध्वनि सुनकर|
मेरी भावनाओं का मंत्र गूंज
उठा था और मैं दार्शनिक की
तरह मंत्र मुग्ध हो उस नन्हीं
परी को निहारे जा रही थी |
जो अंजुरी में पिला रही थी
पानी सूखे पौधों को दौड़कर
नन्हीं बच्ची में परमात्मा के
अद्भुत रुप के दर्शन हुए मुझे|
जड़- चेतन के ऊहा पोह में
कुल्हाड़ी लिए मानव काट
रहा था अपने आप संस्कृति
के जड़ों को संवेदना विहीन
दानव की तरह बारी -बारी से|
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
No comments:
Post a Comment