जिला :- महासमुंद
विषय :- महक
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- महक
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उपवन महके फूलों से,
पाकर महक भौंरे मंडराते।
महक मिले जो आम्र मंजरी के,
दादुर मधुरिम गीत सुनाते।
बरसे बरखा जब जब जग में,
भिगे वसुधा का तन।
पाकर सोंधी महक मृदा की,
झूम उठा है मानव मन।
मनोरम महक पाकर व्यंजन का,
व्याकुल हो उठता उदर।
खोज में उसके भटके मनवा,
ढूँढ़े फिरता इधर - उधर।
पाकर महक कस्तुरी की,
मृग बावरा वन में घूमें।
निज नाभि की खुशबू को,
जंगल - जंगल मृग है ढूँढ़े।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने महक का वर्णन करते हुए प्रकृति में महक को प्रर्दशित करने का प्रयास किया है।
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