Friday, October 30, 2020

रायगढ़ से पुष्पा पटनायक कृत आलेख- संगीत के तत्व एवं वर्तमान परिदृश्य

रचयिता- पुष्पा पटनायक 
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- आलेख
शीर्षक -"संगीत के तत्व एवं वर्तमान परिदृश्य"   
*************************                
              सुव्यवस्थित ध्वनि जो रस की दृष्टि से उत्पन्न होती है वह संगीत कहलाती है।  संगीत के मोहक सुर की मादकता का जीव जगत पर जो प्रभाव पड़ता है वह किसी से छिपा नहीं है । संगीत मनोरंजन के अलावा शांति एवं सुख अनुभूति के लिए प्रयोग में लाए जाने वाली क्रिया है । संगीत में गायन वादन और नृत्य तीनों कला का समावेश होता है।
           संगीत की उत्पत्ति ब्रह्मा द्वारा हुई ब्रह्मा जी ने यह कला देवी सरस्वती को दी फिर इस कला का प्रचार- प्रसार भरत ,नारद ,हनुमान आदि ऋषियों ने पृथ्वी पर किया। क्योंकि इस कला का प्रथम वर्णन सामवेद में हुआ था इसलिए भारतीय संगीत का जनक सामवेद को माना जाता है।
           संगीत के मुख्य  तत्वों में स्वर, ताल तथा लय  हैं। स्वर की देवी माता सरस्वती हैं जो सृष्टि के सभी प्राणियों को स्वर प्रदान करती हैं । स्वर को लय में बांधकर ही संगीत का रूप दिया जाता है,अतः लय संगीत का आवश्यक तत्व है ,लय के अभाव में संगीत का कार्य संचालन संभव नहीं है । यदि संगीत के स्वर रुपहली आभा बिखरते हैं तो लय संगीत को गति प्रदान कर भावपूर्ण  एवं माधुर्यपूर्ण बनाती है । कोई भी कला तभी प्राणवान  होती है जब उसमें गति समाहित हो ।भले संगीत में स्वर को लय से अधिक महत्व दिया जाए परंतु स्वर  लय के बंधन में बंधकर ही परिमार्जित होती है । लय संपूर्ण सृष्टि के कण -कण में व्याप्त है । हमारा संपूर्ण जीवन लय से नियंत्रित होता है ।लय नापने के साधन को जो मात्राओं का समूह होता है ताल कहते हैं। एक प्रकार से ताल लय को प्रकट करने की एक  प्रक्रिया है।
              संगीत का वास्तविक महत्व तब होता है ,जब संगीत की सक्रियता साधना को महत्व देती है। संगीत की मिठास आत्मिक शांति देती है एवं जीवन को जीने की उमंग पैदा करती है । 
           वर्तमान परिदृश्य में संगीत के मायने ही बदल गए हैं। संगीत के तत्व कहीं  पीछे छूटते चले जा रहे हैं। संगीत मन की शांति का नहीं साधन सुविधा प्राप्ति का जरिया बन गया है जहां कल संगीत एक साधना हुआ करती थी वहीं आज उसने अर्थ प्राप्ति और विलासिता का रूप ग्रहण कर लिया है। आज शास्त्रीय संगीत कहीं पीछे रह गया है । लोक संगीत की आड़ में वर्तमान संगीत वीभत्स  एवं कुरूपता लिए हुए दृष्टिगोचर है । नाना प्रकार के वाद्य यंत्रों से ध्वनि की माधुर्यता का विनाश ही नहीं अपितु ध्वनि प्रदूषण भी हो रहा है ।आज लोग इसे ही संगीत का रूप देकर असली संगीत को दरकिनार कर रहे हैं । इक्का-दुक्का कोई संगीत प्रेमी या कलाकार मिल भी जाता है तो वह आधुनिक शोर के पैरों तले कुचल दिया जाता है।
           आज के इस अशांत वातावरण में फिर वही तानसेन की जरूरत है जो अपने गीत- संगीत से दीपक जलाकर अंधकार को रौशन कर दे। मेघों  से पानी बरसा दे और संगीत  से कलियों को पुष्प बना दे।

No comments:

Post a Comment

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...