Saturday, October 17, 2020

रायगढ़ से उर्मिला सिदार कृत आलेख- नवरात्र का अर्थ


रचनाकार- उर्मिला सिदार
विधा- आलेख
विषय- नवरात्र
शीर्षक- "नवरात्र का अर्थ"

पारंपरिक प्रचलित भाषा में नवरात्र का अर्थ 9 दिन तक मां दुर्गा का प्रतिदिन पूजा-पाठ उपासना आदि किया जाता है किसी देवी की पूजा पाठ उपासना को नवरात्र के नाम से प्रतिवर्ष आकार और चैत्र मास में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। लेकिन नवरात्र का अर्थ मध्यस्थ दर्शन में हर शब्द का अर्थ स्पष्ट कर दिया गया है। मध्यस्थ दर्शन का एक सूत्र है प्रतीक से प्राप्ति नहीं उपमा से उपलब्धि नहीं कहने का तात्पर्य है प्रतीक के कोई भी घटनाएं प्रमाणित नहीं होती प्रतीक को घटना रूप में प्रमाणित करना होता है। प्रमाणित कर जीने में हसत जिंदगी से मुक्त जीवन जिया जा सकता है। देने से कोई भी चीज उपलब्ध नहीं होता उसे प्राप्ति के लिए प्रमाणित करने की आवश्यकता होती है। नवरात्र का वर्णन विश्लेषण करने से और इस तरह स्पष्ट होता है जैसे न+व+र+ आ+त्र। न का तात्पर्य  न्याय, व का तात्पर्य वस्तु ,र का तात्पर्य रस अर्थात भाव, आ का तात्पर्य आत्मा ,त्र का तात्पर्य  तीन।   यह तीन नियम है पहला  बौद्धिक नियम दूसरा सामाजिक नियम तीसरा प्राकृतिक नियम इन तीन नियमों को जानना मानना पहचानना और निर्वाह कर जीना ही नवरात्र है। हम नवरात्र करने का उद्देश्य है सुख शांति के साथ जीना इन तीन नियमों से ही हर व्यक्ति प्रमाणित कर सुख शांति के साथ जी सकता है अतः हमारी आत्मा में दुर्गा आचरण के रूप में एवं व्यवहार के रूप में शक्ति का प्रयोग कर हम जीवन में निरंतर सुख पूर्वक जी सकते हैं। प्रतीक और आडंबर से आज तक किसी भी मानव ने निरंतर सुख पूर्वक जीने को प्रमाणित नहीं किया है अगर सच्चाई को स्वीकार कर
प्रमाणित कर जीते हैं तो हर व्यक्ति सुख पूर्वक जी सकता है
दूसरा अर्थ है नवरात्र अर्थात नव अर्थात भाव के साथ जीना संबंधों में नव रसों के साथ जीना और उपरोक्त लिखी तीन नियमों के साथ जीना ही नवरात्र कहलाता है कोई भी व्यक्ति से जांच कर सकता है अगर सही लगता है तो इसे अपनाकर सुख पूर्वक जी सकता है।

उर्मिला सिदार
ग्राम बुलाँकी रायगढ़ छत्तीसगढ़


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