Friday, October 16, 2020

रायगढ़ से पुष्पा पटनायक की कृति(संस्मरण) - माँ

रचयिता- पुष्पा पटनायक
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा-संस्मरण
शीर्षक -"माँ "  
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       माँ दुनिया की सबसे अनुपम कृति है।  कहते हैं इसका अहसास माँ बनकर की अनुभव की जा सकती है, पर  मैंने तो एक बेटी के रूप में ही माँ के अनुपम वरदान होने का अहसास कर लिया।
             मैं अगर माँ के बारे में लिखने बैठूं तो सुबह से शाम और रात से फिर सुबह हो जाएगी फिर भी मैं मां के गुणों को कागज के पन्नों में बयां ना कर पाऊंगी । लेकिन मैं एक वाक्या जरूर बताना चाहूंगी जो मैं मर के भी नहीं भूलना चाहती  हूं।  
          बात उस समय की है  जब मैं 12वीं की वार्षिक परीक्षा दे रही थी । दो पेपर ही हुए थे और मेरी तबीयत बहुत खराब हो गई ।  उस समय मेरे पिताजी अपने विभागीय ट्रेनिंग के   लिए देहरादून गए हुए थे। मुझे तो चिंता थी कि मैं कैसे पढ़ूंगी ? मेरे पेपर का क्या होगा ? मेरे नंबर कम आ जाएंगे वगैरह -वगैरह ।  मेरी माता जी को मुझसे दुगुनी चिंता थी या मैं कहूं सौ गुनी  तो गलत नहीं होगा । वह मेरा दिन-रात ख्याल रखती मेरे खाने-पीनेे ,दवाइयां ,नहाने -धोने यहां तक कि मुझे यानी 50 किलो को अपने बाहों का सहारा देकर  उठाती और घंटे- घंटे  मेरी पुस्तको को  पढ़कर मुझे सुनाती । मैं चुपचाप सुनती रहती ।आपको मैं बताना चाहती हूं कि मेरी मां मात्र पांचवी तक पढ़ी लिखी थी, पर उसने मेरे लिए 12 वीं की जीव विज्ञान ,वनस्पति विज्ञान  की किताब तक पढ़ी ।  मां ने मुझे अपने भरसक प्रयास से परीक्षा के कमरे तक पहुंचा दिया और तीसरे पेपर के दिन जब मैं लिख नहीं पा रही थी तो वह पूरे 3 घंटे परीक्षा हाल के बाहर खड़े-खड़े बिता दिए यह सोच कर कि मैं कैसा महसूस कर रही हूं।  उन्होंने परीक्षा केंद्र प्रभारी श्री पांडे सर जी से मेरे लिए लेखन सहायक के लिए भी मांग की परंतु उन्होंने इसके लिए स्वयं को किसी को लाने को कहा ।  तो वह स्वयं भी लिखने को तैयार हुई पर सर जी ने कहा कि यह नहीं हो सकता तो वह बहुत दुखी हुई थी ।
           मैं इतनी कमजोर हो गई थी कि मेरे शरीर में मात्र 6 ग्राम हीमोग्लोबिन था । आप समझ सकते हैं कि इस स्थिति में मुझे मेरी मां ने संभालते हुए पूरी परीक्षा दिलवाई और मैं भी दे पाई यह मेरी मां का ही आशीर्वाद था जो मैं बाकी के तीन पेपर  की परीक्षा में बैठ पाई ।
       जब 12वीं का रिजल्ट आया तो 54% से मैं उत्तीर्ण थी हां यह मेरे अब तक के सबसे कम प्रतिशत थे।पर जो खुशी मुझे इस समय हुई वह पहले कभी ना हुई थी ।मुझे पिताजी ने श्रेणी सुधार करने की सलाह दी और कई रिश्तेदारों ने भी कहा ,पर मैंने मेरी मां की मेहनत और अपार प्यार और स्नेह से प्राप्त 54% से ही आगे बढ़ने का फैसला लिया ।
एक बात और भी है कि मेरी मां का ही आशीर्वाद था कि सामान्य दर्जे के विद्यार्थियों के लिए अभी तक सबसे कम प्रतिशत 54 को भी बीएससी प्रथम वर्ष में एडमिशन मिला और जैसा कि आप जानते हैं आज मैं एक शिक्षक हूं ।
          मां तेरे प्यार और दुलार की मैं हमेशा कर्जदार रहूंगी ।
मैं तेरी बेटी बनकर धन्य हो गई "माँ "।
धन्यवाद माँ


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