Saturday, October 10, 2020

पुष्पा पटनायक की रचना- प्रलय का विप्लव

रचयिता- पुष्पा पटनायक 
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- कविता 
शीर्षक -"प्रलय का विप्लव"
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आज दुनिया को विप्लव ने घेरा है 
जहां कई व्यथाएँ कई निराशाएं है 
चंद उचाईयों तक पहुचने के लिए 
टूटती आशाएं और सीमाएं हैं।

नैतिकता जाने कहां गुम हुई 
सुकून का भी नामोनिशान नहीं 
दौड़ती भागती जिंदगी हुई 
ठहरने के लिए कोई छांव नहीं ।

कबीर के दोहे याद आते हैं 
काल करे सो आज करले 
और आज करे सो अब करले
यही क्रियाकलाप इरशाद  है ।

आज करने की इतनी होड़ 
कि कल पर नहीं कोई जोर है
आज और अब ने ही थाम लिया 
कल की सारी चीजें दरकिनार हैं ।

धर्य ना रहा और ना रही शांति 
भागम भाग जिंदगी में
केवल अशांति ही अशांति 
विकास का हो रहा लोगों को भ्रांति ।

विलक्षण लक्षण विप्लव की 
रोके ना रुके कोई
कर रहे सब मनमानी हैं
शायद यही प्रलय की निशानी है ।

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