जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-कल हो न हो
विधा-कविता (मुक्त छंद)
व्यवहार का आईना साफ रख,
इंसानियत की तिजोरी खोल|
मधुर वाणी की दौलत बांट लो,
किसने देखा है ,कल हो न हो|
शांति ही तो है सबसे बड़ी लक्ष्मी,
पैसा तो है चंद दिनों का मेहमान|
सुव्यवस्थित कर लो घर -आंगन,
किसने देखा है, कल हो न हो||
तब रेगिस्तान भी हरे हो जाऐगे,
जब अपना फर्ज निभा पाऐगे|
आज ही इतिहास नया बना दो,
किसने देखा है , कल हो न हो|
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर,छग
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