रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
विषय :- ओस की बूंद
#######################
देख शरद को आते सज-धज,
देखो वसुधा शरमाती है।
बड़े सवेरे धुंध को ओढ़े,
वह पानी - पानी हो जाती है।
मोती सी बूंदे ओस की,
तृण - तृण को चमकाती हैं।
मानो पौधों में फूलों के बदले,
मोतियाँ खिल जाती है।
उसपर पड़ती रवि की किरणें,
धरती का श्रृंगार करे।
रवि किरण के टुकड़े कर,
जीवन में नव रंग भरे।
नव रंग भरे वह भोर काल में,
मन भौंरा इठला जाए।
हल्की हल्की धुंध धरा में,
स्वर्ग का भ्रम दिला जाए।
क्षण भर का जीवन पाकर भी,
मन गदगद कर जाती है।
इसीलिए हर जन मन को शरद में,
ओस की बूंदें भाती है।
#######################
व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने ओस की बूंदों का वर्णन करते हुए प्रकृति का मानवीकरण करने का प्रयास किया है, साथ ही यह बताया है कि शरद ऋतु में भोर काल में ओसयुक्त प्रकृति का सौंदर्य बहुत ही मनोरम होता है।
Monday, October 19, 2020
महासमुन्द से विनोद कुमार "जोगी" की रचना- ओस की बूंद
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत
कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528 दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो काति...
No comments:
Post a Comment