रचनाकार - लीलाधर कुम्हार
जिला - बलौदाबाजार ( छ. ग. )
विषय - ओस की बूंद
विधा - छंद मुक्त कविता
शीर्षक - ओस की बूंद
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// ओस की बूंद //
नैसर्गिक संरचना न्यारी ,
मानो धरती रत्न जड़ित ।
मोती जैसे ओस की बूंद ,
सजी-धजी दुल्हन ज्यों शोभित ।।
नभ के सर्व सितारे उतरे ,
सुबह खेत - मैदानों पर ।
चमके दमके जहाँ - तहाँ ,
शीतलता बरसाते झर - झर ।।
नग वाली नथ पहन के स्वच्छंद ,
चटक - मटक करती तृण-बाला ।
ऐसी मोहिनी रूप ओस की ,
कवि - दार्शनिक मतवाला ।।
अद्भुत सुंदर चित्ताकर्षक ,
ओस की बूंद लगती है ।
तेज धूप स्पर्श हवा को ,
कभी नहीं वह सहती है ।।
थोड़ा जीवन थोड़ी साँसे ,
लेकिन जी भर जी लेती है ।
रंग - रूप से सबको लुभाती ,
प्रेम लाभ सुख देती है ।।
हमारा जीवन भी ओस की बूंद ,
अल्प समय की अल्प कहानी ।
स्वस्थ मस्त हों खुशियाँ बाँटें ,
सबसे प्रेम व्यवहार की बानी ।।
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Monday, October 19, 2020
बलौदाबाजार से लीलाधर कुम्हार की रचना- ओस की बूंद
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