Thursday, October 29, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना- परिवर्तन

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
     विधा - मुक्त कविता 
   शीर्षक - "  परिवर्तनशील समय "
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बलवान है तू बहुत, सबको सबक दे जाता है। 
मुट्ठी से रेत जैसे, पल भर में फिसल जाता है।। 

जब तक था पास मेरे, तेरा मूल्य समझ नहीं पाया। 
हाथ मलता रह गया, रो कर बहुत पछताया।। 

न कोई राजा, न कोई रंक।
समय के आगे सब बेरंग।।
 
कालचक्र सदा एक-सा नहीं, 
वक्त सभी का एक दिन आता है। 
याद रहे, तुच्छ चींटी भी एक दिन, 
हाथी को धूल चटा जाता है।। 

चार दिन की ये जिंदगी,
न किसी से बैर,न द्वेष कीजिए। 
सत्य, सत्संग, समय का आदर, 
अपने जीवन में समावेश कीजिए।। 

ढल गया शाम आज तो क्या हुआ, 
सवेरा भी तो फिर से आता है। 
समय रहते जो सत्कार्य कर ले, 
सफल इंसान वही कहलाता है।। 
               
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मौलिक रचना (स्वरचित) 
संतराम कुम्हार 
बलौदाबाजार (छ.ग.)

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