जिला :- महासमुंद
विषय :- संगीत
शीर्षक:- संगीत प्रकृति में बसी है।
विधा :- छंद मुक्त कविता
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सुनो सवेरे, संध्या काल में भी,
कलरव पक्षियों के सुरमई संगीत।
कभी झींगुर की मधुरिम,
गाते किट - पतंगें मधुर गीत।
जताती जग को यह बात,
संगीत प्रकृति में बसी है।
सरसराते हवा के झोंके,
कल - कल करती बहती सरिता।
पशुओं का ताल से ताल मिलाना,
सावन में दादुर के बोली की मधुरता।
संगीत से मिटते दुख - दर्द,
संगीत ही देती हँसी है।
बोली में संगीत, खेती में संगीत,
संगीत बसी जगत के हर काम में है।
संगीत सांसों में, संगीत राहों में,
संगीत परमात्मा के नाम में है।
बिना संगीत जीवन बेरंग,
बस उलझनों में फंसी है।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने संगीत के बारे में लिखते हुए कहा है कि - संगीत जीवन में है, संगीत प्रकृति में है, संगीत ईश स्मरण में है। और संगीत के बिना जीवन बेरंग है।
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