रचयिता-मीरा आर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-माँ
विधा-मुक्त छंद
माँ कहीं भी रहे,
हमेशा होती है
आसपास ।
भले स्मृतियों
में ही सहीं।
जब हम थक
गये होते हैं,
परेशानियों का
तपिश मन को
झकझोर
रहा होता है।
माँ बहती है
शीतल नदी
की तरह,
उफान को
कसे हुए
मुट्ठियों में।
वह हमें कभी
सूखने
नहीं देती,
पेड़ों की तरह
सींचती है,
अपने ममता की
शीतल बयार से ।
माँ अँधेरे में
टिमटिमाती है,
विचलित नही
होती आँधी या
तूफान से ।
माँ की प्रार्थना में
ईश्वर का आशीष
झरता है,
वह दर्द को
निथारती है,
और छुपा
लेती है
पलकों में ।
माँ जैसी तो
केवल माँ
होती है,
निच्छल,
निर्मल
ममता की
मूरत।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर,छग
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Friday, October 16, 2020
मीरा आर्ची चौहान की रचना- माँ
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