Wednesday, October 21, 2020

संतराम कुम्हार कृत सृजन- कलेक्टर साहिबा

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
    विषय - परिश्रम 
     विधा - रेखाचित्र 
   शीर्षक - " कलेक्टर साहिबा "
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सुदूर से एक सरकारी वाहन बहुत शान से हमारे गाँव की तरफ आ रही थी। गाड़ी में लाल बत्ती लगी हुई थी और सायरन आवाज ऐसा कर रही थी मानो कोई एम्बुलेंस का गाड़ी किसी आपातकालीन में आ रहा हो। चूँकि हमारे गाँव की सड़क कच्ची थी  इसलिए धूल से गाड़ी की पहचान करना मुश्किल हो रहा था। पूरे गाँव में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया। सब डर गए थे कि आखिर ये गाड़ी इधर क्यों आ रही थी। 
        कुछ समय उपरान्त गाड़ी मेरे नजरों के सामने साफ नजर आने लगी। ओ कोई एम्बुलेंस गाड़ी नहीं थी बल्कि जिला कलेक्टर लिखा हुआ था वाहन पर। सब गाँव के लोग चौंक गये क्योंकि गाँव में पहली बार कोई कलेक्टर की गाड़ी ने दस्तक दी थी। सभी बहुत उत्सुक थे कि आखिर ये कलेक्टर कौन है और क्यों आई है हमारे गाँव में। सायरन का बजना बंद हुआ। बंदूकधारी सुरक्षाकर्मी ने कलेक्टर मैडम के वाहन का दरवाजा खोला। तभी अंदर से एक बहुत ही सुन्दर लड़की निकली जो कि उस जिले की कलेक्टर थी। 
          लड़की ने जैसे गाँव की ज़मीन पर कदम रखा उसने सबसे पहले वहाँ की मिट्टी को सादर प्रणाम की और उसकी आँखों से आँसू टपक कर जमीन पर गिर गये। गाँव के सभी लोग बहुत अचंभित थे आखिर ये कलेक्टर साहिबा हमारे गाँव के मिट्टी पर इतना भावुक क्यों हो गई। सभी एकटक होकर कलेक्टर साहिबा को ही देख रहे थे। ओ रो रही थी मगर अभी तक कोई कारण सामने नहीं आई थी। तब कलेक्टर साहिबा ने शांत होकर बोलना शुरु किया। 
           मैं राधा हूँ। आपके गाँव की ही बेटी। ये सुनकर सभी और भी अचम्भित हो गये क्योंकि राधा नाम की लड़की किसी के स्मरण में नहीं आ रही थी। तब उसने वर्षों पुरानी कहानी बतायी कि वह रामलाल कुम्हार की बेटी राधा कुम्हार है। तब गाँव वाले बोले वही शराबी रामलाल जिसने अपनी बेटी को शराब के लिए शहर में बेच आया था। और जिनका ५ वर्ष पहले कैंसर से निधन हो गया था। तब कलेक्टर साहिबा बोली हाँ मैं उन्हीं की बेटी हूँ। मेरे पिता मुझे मेरी पढ़ाई बंद कराकर मुझे शहर में बेच आये थे  ।ओ बोला करते थे पढ़ाई करके क्या कर लेगी। हमेशा ताना मारते थे कि कौन-सा कलेक्टर बन जायेगी। तभी मैंनै ठान ली थी कि अब मैं उन्हें कलेक्टर बनके ही दिखाऊंगी। मैं उस जिस्म के सोदागरों के पिंजडे़ से कैसे भी करके भाग गयी थी। फिर शहर में ही भीख मांग कर जीवन जी रही थी। 
        एक दिन भूख से फूटपाथ रो रही थी तभी एक आटो वाला खुदा का मसीहा बनकर मेरी जिंदगी में आये। उन्होंने मुझे मेरे बारे में पूछा मैंने रो-रो के सारी कहानी सुनाई। फिर ओ मुझे अपनी बेटी बनाकर अपने साथ लेकर चले गये। क्योंकि उनकी खुद की कोई बेटी नहीं थी और मुझे खूब पढ़ाया लिखाया और मैंने भी खूब मेहनत की और कलेक्टर की परीक्षा पास की और आज मैं आपके सामने हूँ। एक मेरे पिता थे जिन्होंने शराब के लिए मुझे बेच दिया और एक मेरे मुँह बोले पिता आटो वाले ने मेरे पढ़ाई के लिए शराब के साथ-साथ अपनी सारी खुशियों का त्याग कर दिया मेरे सपनों को पूरा किया। सभी उनकी दुःखभरी कहानी सुनकर रो पड़े। कलेक्टर साहिबा ने गाँव में उच्चतर माध्यमिक स्कूल खुलने की भी जानकारी दी। फिर कलेक्टर साहिबा सभी बड़ों का आशीर्वाद लेकर वापस आ गई। गाँव वाले ने उन्हें ढेर सारा तोहफा और बहुत सारा प्यार भी दिया। 
         
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मौलिक रचना (स्वरचित) 
संतराम कुम्हार 
बलौदाबाजार (छ.ग.)

1 comment:

  1. Bhaut badhiya bhai....
    अपना लक्ष्य हमेशा ऊंचा रखना चाहिए

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