स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- रेखाचित्र
शीर्षक -"परिश्रम "
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छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव का दृश्य है ।जहां शासन की योजनाएं भी पहुंचना पाई थी अभी- अभी की बात है बिजली के खंभे गड़े और अंधकार में लोगों के जीवन में रोशनी की किरणों ने दस्तक दी ।
इसी गांव में एक गरीब खेतिहर मजदूर मंगलू और उसका परिवार भी रहता था मंगलू एक मेहनती मजदूर था । देखने में गठीला शरीर बड़ी-बड़ी भुजाएं जिसके बलबूते वह परिवार के 6 लोगों का भरण पोषण करता था। वह दिन रात दूसरों की खेतों में मेहनत करता और मेहनत की कमाई से अपने परिवार का गुजर-बसर करता। उसके परिवार में उसकी पत्नी महतो एक सीधी-सादी घरेलू महिला थी जो घर का कामकाज करती बच्चों को संभालती और साथ ही साथ वह अपने पति मंगलु की खेतों में सहायता भी करती थी। उसके दो बच्चे थे इमरती और मोहित वह भी कुछ न कुछ कार्य किया करते थे। घर में बुजुर्ग मां-बाप भी घर की देखरेख में अपना समय बिताते थे ।मंगलू का पूरा परिवार दिन भर कड़ा परिश्रम करता और तब जाकर उनका जीविकोपार्जन सक्षम हो पाता था ।
इसके बाउजूद मंगलू और महतो का व्यवहार गांव में एक मिसाल कायम किए हुए था। क्योंकि गांव के किसी भी परिवार में दुख होता तो मंगलू और उसका परिवार उसकी मदद करने अवश्य उपस्थित होते थे ।ऐसे में मंगलू की छवि गांव में एक अच्छे इंसान के रूप में स्थापित थी।कठिन परिश्रम के बाद भी मंगलू की आमदनी सिर्फ एक परिवार को दो वक्त की रोटी देने योग्य थी ।
एक दिन मालिक के ट्रैक्टर के चक्के में मंगलू का पैर आ जाने से वह चोटिल हो गया । वह कराहता हुआ घर आया घर के सभी सदस्य देख बहुत दुखी हो गए ।उनके चेहरे मायूसी से भरे हुए थे ।मंगलू भी अपनी इस घटना से व्यथित था ।उसे घाव से ज्यादा अपने कल की चिंता सता रही थी। वह परिवार का एकमात्र कमाने वाला था पर इसी बीच मंगलू की पत्नी बड़ी धैर्यता से बोली दुखी मत होइए जी जब तक आप ठीक नहीं हो जाते मैं चूड़ी बेचने का कार्य कर लूंगी । मेरी सहेली कुसुम यह धंधा करती है और मुझे भी यह काम आ ही जाएगा ,देखिये चूड़ी ले लो हरी पीली रंगीली लाल चूड़ी ले लो कहते हुए उसकी आंखें आंसुओं से भर आई ,तभी उनके बच्चे इमरती और मोहित भी बोल पड़े पिताजी जयप्रकाश साहूकार के दुकान में हमें भी कुछ ना कुछ कार्य मिल ही जाएगा और वह एक दूसरे की चेहरे की तरफ देखते हैं और ऐसे चेहरा बनाते हैं जैसे की कुछ हुआ ही न हो ।तभी माता-पिता भी बोल पड़े बेटा चिंता मत करना हम लोग समारू के बगीचे से आम और अमरुद भेज दिया करेंगे कुछ ना कुछ तो हमे भी मिल ही जाएगा ।
इतने में गांव के कुछ लोग आते हैं मंगलू और परिवार के लोगों को सांत्वना देते हैं ।सभी लोग मंगलू की दशा देखकर दुखी होते हैं। उसे अस्पताल ले जाया गया और अस्पताल में डॉक्टरों के द्वारा छति अधिक होने के कारण मंगलू के पैरों को काटना पड़ा ।
जितने भी लोग थे वह सांत्वना देकर चले गए। मंगलू ने सभी की कुछ न कुछ सहायता की थी पर वह कहते हैं ना बुरे वक्त में कोई साथ नहीं देता ।सुख के सब साथी होते हैं और दुख में कोई नहीं, वही स्थिति यहां पर देखने को मिली । सभी लोग चले गए केवल घर वाले बचे थे जिन्होंने मंगलू को अपनी तरफ से ढाढस बंधाया था ।और कहा था कि आप चिंता मत करिए हम सब संभाल लेंगे ।
मंगलू अभी तक तो खामोश था ।लेकिन जैसे ही उसे पता चला कि उसके पैर अब नहीं रहे तो वह उन सभी परिवार के सदस्यों को अपनी बात रख कर ढांढस बंधाया परिश्रम करने की चाहत और लगन अगर इंसान में हो तो वह कुछ भी कर सकता है । मैं अभी भी परिश्रम से तुम्हारी सहायता कर सकता हूं। आप लोग मन दुखी मत करो।
मंगलू की इस कहानी से यही शिक्षा मिलती है कि परिश्रम ही जीवन को सार्थक और सुखी बनाता है।
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टीप-: मंगलू और उसके पारिवारिक जीवन का रेखाचित्र
खींचने का प्रयास है।वास्तव में मंगलू एक पात्र है जो एक नायक की भाँति योग्यता प्रदर्शित करता है।
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