संबलपुर, जिला-कांकेर (छ .ग.)
विषय-परिश्रम,विधा-रेखा चित्र
*परिश्रम का फल*
रीता सांवले नैननक्श वाली दुबली -पतली इतनी कि तेज हवा उसे बहाकर ले जाएं। माँ-बाप बचपन में स्वर्ग सिधार गए थे। चाचा रौबीले कद काठी...आवाज ऐसी की लोग कांप जाते थे।चाची साधारण कद काठी की थी मगर घर में उसका ही वर्चस्व था।बेचारी रीता पढ़ाई में तेज थी मगर अपनी जरूरतों को चाचा-चाची के पास कह नहीं पाती थी ।वह मायूस हो जाती थी। बी.ए.उत्तीर्ण करने के बाद उसका विवाह हो गया। पति बड़े सुलझे व्यक्तित्व का मिला ।वह धन्य हो उठी उसे लगा अब अपने सपनों को पूरा कर पाएगी ।आशा के अनुकूल पति ने कहा -"तुम्हें जितना पढ़ना है पढ़ो मेरा पूरा सहयोग तुम्हें मिलेगा।" गाँव से शहर आई .. ..रीता शहरी चकाचौंध..... चमचमाती तारकोल की सड़कें.... रंग बिरंगी विद्युतकी तेज रोशनी देख उसे लगता जैसे वह स्वर्ग में आ गई है।दिन-रात परिश्रम के साथ प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के साथ गृहस्थी का कार्यभार भी उसने बखूबी ढंग से निभाया ।रात दिन की मेहनत और पति की प्रोत्साहन के बल पर उसने पी. एस .सी. की परीक्षा उत्तीर्ण की और उसकी नियुक्ति डिप्टी कलेक्टर के रूप में अपने प्रदेश में ही हो गई ।इसका श्रेय उसने पति को दिया मगर पति भी गौरवान्वित हो उठा और उसने कहा कि -"यह तुम्हारे परिश्रम का फल है जो तुम यहाँ तक पहुँची हो।"यह सुनकर रीता निहाल हो उठी और कमजोर लता के जैसे पति के मजबूत बाँहों में लिपट गई।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर,(छ .ग.)
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