स्थान-नवापाराखुर्द/सक्ति
जिला- जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा-कविता (एकावली अलंकार पर आधारित)
शीर्षक-पिताजी
घर, घर में आंगन,आंगन में तुलसी का पौधा ।
पौधा , पौधा से कल्याण,कल्याण से भवसागर पार जाई ।
घर, घर में पिताजी, पिताजी की दोहा चौपाई ।
चौपाई में बात, बात में सीख,सीख काम का भाई ।
रोज, रोज का वही काम, काम से आराम ।
आराम, आराम से सुख,सुख सबके नसीब में कहां भाई ।
रामायण, रामायण पढ़ना, पढ़ना मतलब उसी राह चलना
चलना , चलना याने अपनाना, अपनाना अर्थात प्राण जाय
पर वचन न जाई ।
मैं उनका पुत्र ,पुत्र अर्थात कुल दीपक, दीपक समझो उनके वंश को आगे बढ़ाने वाला ।
वाला, वाला जिसे कहेंगे उतराधिकारी, उतराधिकारी उनके पग चिन्ह अपनाई ।
उनके चरणों में प्रणाम,प्रणाम उनसे आशीष, आशीष उससे कल्याण ।
कल्याण,कल्याण से सब सपने सच,सच से चरण रज शीश
नवाई ।
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