विधा- आलेख
विषय -शाँति
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🌷शाँति🌷
हर व्यक्ति शांति वातावरण में रहना पसंद करता है ।क्योंकि किसी भी मानव जात को अशांति स्वीकार्य नहीं होता। प्रश्न आता है, की किसी तरह से शांतिपूर्वक रहा जाय। शांति तो सभी चाहते हैं। लेकिन शांति कैसे रहा जाय ।लोगों के विचार में नहीं आ रहा है। हर के मन में कामना है। शांति पूर्वक जीने की। किसी भी मनुष्य को पूछा जाय ,आप शांति से जीना चाहते हो, कि अशांति से तत्काल उत्तर आता है ,शांति से लेकिन कैसे शांति से जिया जाय पता नहीं है ।शांति से जीने की शैली नहीं है। शांति के मूल में अभाव विहीन जीने को शांति कहा जाता है अर्थात किसी भी चीजअर्थात बौद्धिक शक्ति एवं भौतिक शक्ति तथा शुद्ध वातावरण की कमी ना होने से मानव शांति से रह सकता है। परिवार में विचार की एकरूपता ना होने भौतिक वस्तुओं के अभाव से अशांति पैदा होती है। लोग भौतिक वस्तु को श्रेष्ठ मानते हुए जी रहे हैं। लेकिन भाव (ज्ञान) की कमी जो आचरण में प्रकट होता है ।अगर भाव की कमी है, तो वह मानव कितना भी संपत्ति क्यों ना रहे भावों के बिना अशांति में जीता है। अतः मनुष्य को शांति में जीने के लिए भाव के साथ जीते हुए ,आवेशों का त्याग जैसे काम, क्रोध लोभ मोह ,मद मात्सर्य इन 6 आवेश अशांति का जड़ है। भय, आस्था प्रलोभन और पांच इंन्द्रिय संवेदनाएं नियंत्रित न हो तो अशांति का वातावरण बना रहता है। भौतिक वस्तु के लिए श्रम से समृद्धि से पूर्ती की जा सकती है और भौतिक शक्ति की पूर्ति समझ कर जीने से की जा सकती है अर्थात जो प्रकृति में व्यवस्था है ,उस व्यवस्था को समझकर जिने से किसी भी वस्तु की कमी अभाव नहीं होगा ।अज्ञानता और अभाव से ही अशांति का वातावरण बनता है। शांति बनाए रखने के लिए ज्ञान एवं धन की आवश्यकता होगी। जिसे ज्ञान की रोशनी मैं समझ कर समाधान पूर्वक जीने से सुख शांति का वातावरण बना रहता है। अतः हर मनुष्य को व्यवस्था को समझना समीचीन आवश्यकता है। समझ के जीने में ही सुख शांति है। नहीं तो अशांति से तो जीना हो ही रहा है। अतः संपूर्ण मानव जाति को समझने का मौलिक अधिकार है। सभी को समझना अनिवार्य है। समझ से सुख और श्रम से समृद्धि शांति का उदय होता है। यही सुख शांति से जीने का रास्ता है।
श्रीमती उर्मिला सिदार
रायगढ़
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