पेंडरवानी, बालोद, छत्तीसगढ़
शीर्षक -आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू
आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू
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इस महामारी के दौर में ,
कइयों ने अपनों को खोये हैं ,
जिनके अपने नही बिछड़े ,
वे मानवता से रिश्ते संजोये हैं ,
जिन्हें पत्थर दिल जान कोसा करते थे ,
वे भी आज फूट फुटकर रोये हैं ,
आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू है शायद ,
कि दूसरों के दर्द में लोग हमदर्दी के बीज बोए हैं ,
वह एक आंसू , जो छलक पड़ता है ,
गम में , खुशी में , अपनेपन में ,
एक आंसू जो छलक पड़ता है,
तन में , मन में , विरह की अगन में ,
एक आंसू जो जरूरी है ,
बिछोह में , मिलन में ,
एक आंसू जो नाकाफी है ,
प्रीत में , बंधन में , दुनिया की उलझन में ,
वो आँखों के किनारे ठहरा है ,
पर ! छलक पड़ता है भावावेश में ,
नही देखता कि कौन अपना है ?
कौन...... बेगाना ?
आँखों के किनारे ठहरा एक आंसू ,
- - शैलेन्द्र कुमार चेलक - -
बहुत सही लिखे चेलक सर
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