Monday, October 12, 2020

रायगढ़ से उर्मिला सिदार की रचना- धरा की पुकार

रचनाकार -उर्मिला सिदार 
 ग्राम- बुलाँकी 
 जिला -रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
 विधा -कविता
 शीर्षक- "धरा की पुकार"
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*धरा की  पुकार*


धरती माता पुकार रही है,
 सुनो रे इंसान ,
मुझ पर खतरा आन पड़ी है ,
जागो रे इंसान,
जागो रे इंसान।

वनस्पति से विहिन हो गई, 
खनिज से हो गई खाली ।
पर्यावरण प्रदूषित हो गई ,
जीवों की हो रही हलाली।

 अव्यवस्था फैलाने वाले मानव, 
 क्या अव्यवस्था में जी पाओगे।
 प्रकृति को रौंदने वाले तुम,
 क्या सुख चैन से जी पाओगे।

मिट्टी ,जल ,वायु प्रदूषित हो गई,
भ्रमित मानवों की देन से।
ऋतु संतुलन बिगड़ गई है,
न कोई सुख से है न चैन से।


हर मानव में घुटन भरा है,
हर परिवार में हो रही टूटन, 
अनेक घटनाएं समाज में घट रही,
प्रकृति में हो रहा प्रदूषण।

भौतिक दुनिया में जीने वाले,
मति तुम्हारी मारी गई है।
प्रकृति की व्यवस्था बिगाड़ने वाले,
तुम्हारी जीना दूभर हो गई है।

सुविधा संग्रह की ढेरों पर मानव,
तुम कब तक खड़े रहोगे ।
कब काल के गाल में समाओगे,
जिंदगी गिनते रह जाओगे।

अपराध प्रवृति छोड़कर मानव, 
मानवीता को अपनाओ जी,
इसी में जग का भला है मानव, 
ऐसी दुनियाँ रचाओ जी।

अपना पराया त्याग कर मानव,
मानव ,मानव से गले लगाओ जी।
एक दूसरे का सहयोग कर मानव, 
सुख समृद्धि का मार्ग अपनाओ जी।

भोगो उन्मादी  प्रवृत्ति को
छोड़कर ,
वास्तविकता को अपनाओ जी।
धरती पर सभी का जीना बन
जाए,
ऐसी व्यवस्था बनाओ जी।

आ गया है जगने का समय,
जागो और जगाओ जी।
समृद्धि धरती जीने का आधार,
इस धरती को सजाओ जी।
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 उर्मिला सिदार  रायगढ़ छत्तीसगढ़

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