रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवासी-रायपुर, छत्तीसगढ़ ।
जिला-रायपुर ।
शीर्षक- ""मुक्तक ""
विधा -छंद मुक्त ।
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●●●||••मुक्तक ••||●●●
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(01)
समय धार ने,
मुझे जीना सीखा दिया ।
अपनी भूख मिटाने,
अपनी टोपी,दूसरों को पहना दिया ।
(02)
मौत आना तो,इक सच्चाई है,
पर,प्यार के खेल में,
शय और मात खाना,
उसकी गहराई है ।
(03)
जिन्दगी को,गफ़लत में,जीने वाले,
प्यार के नशे में,
अपने को,फना करने वाले,
जरा सम्हल के चल ,
जिन्दगी मिले ना,दुबारा ।
(03)
दाँस्ता,जिसे भी,
मैंने अपनी सुनाई ,
उसने,हमदर्दी जतायी थी,बहुत,
पर,मदद की,इक गुहार,की तो,
इस रिश्ते से,हुये थे,दूर बहुत ।
(05)
आगे बढ़ते रहने की,चाहत में,
'अरमान 'मैं,कई बार,फिसली हूँ,
मैं,अक्सर,सोचती हूँ,क्या --?
जिन्दगी में,फिसलना जरूरी है,
इसलिए तो, मैं--
आज तक,सम्हल नहीं पाई हूँ ।
(06)
कहते हैं,लोग बहुत---
जिन्दगी धूप-छाँव का खेल है,
और गरीबी,एक कड़ुवी सच्चाई है ।
अमीर रक्खें,उपवास तो,
कोई बात नहीं--
पर,गरीब रक्खें तो,
उठते,जमाने से,कई सवाल हैं ।
======== इति ===========
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