जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- *परिश्रम*
विधा-रेखाचित्र
किसी भी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किया गया प्रयत्न ही परिश्रम है ।परिश्रमी व्यक्ति जीवन में कभी असफल नहीं होता ।यह कथन तब सत्य सिद्ध हुआ,जब मैं केमिस्ट्री में एम.एस-सी की परीक्षा 1995में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण कर इस विषय में कांकेर में एम.एस-सी .करने वाली प्रथम छात्रा साबित हुई।
उन दिनों इस विषय में एम.एस-सी. करना बहुत मुश्किल काम माना जाता था ।ये मेरा कमजोर विषय था।बेसिक ज्ञान नहीं था।हिंदी मीडियम से अंग्रेजी मीडियम में पढ़ना बहुत मुश्किल लगा।
पहले टेस्ट में 25 में रटकर 16नंबर पाई।अंग्रेजी माध्यम के सहपाठी फेल हो गये थे ।मुझे लगा नहीं कर पाऊंगी,कांकेर वापस जाकर हिन्दी में एम.ए.कर लूंगी ।
H.O.D. डॉ.व्ही.एस.एस.वेमोरी सर ने चेम्बर में बुलाया,कहा-आर्ची!सुना हूँ तुम वापस जा रही हो ।क्यों? मैने कहा -सर!मीडियम की समस्या है।सर ने कहा-आप वापस नहीं जायेंगी।मुझे विश्वास है,अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होकर यहाँ से जाएंगी ।
सर के कहने पर लगा कि कुछ कर पाऊंगी।वार्षिक परीक्षा में पहला पेपर ठीक बना किंतु दो पेपर बिगड़ गये ।फेल होना तय था।10 दिन की छुट्टी में घर आई।चौथा पेपर नहीं दूंगी ।बाबूजी बोले -कल वापस जाओ।वहीं रहकर पढ़ाई करो।वापस आकर
तीन यूनिट ही तैयार कर पाई।
रिजल्ट आने पर मैं पास हो तो गई थी पर 50%अंक थे।पाँच विद्यार्थी ही पास थे।
फाइनल ईयर में ठान ली थी,प्रथम श्रेणी कवर करना है ,जो टेढ़ी खीर थी। विवेकानंद का अनमोल वचन - *बिना उत्साह के उच्च लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती ।* लिख कर रखी थी।जब भी आलस आता, यह पढ़कर फिर पढ़ाई करती ।
सारे पेपर अच्छे बने थे।रिजल्ट आया ।मेरे सर्वाधिक अंक थे।मैं 75%अंक पाई थी। मैं प्रथम श्रेणी कवर कवर कर ली थी ।
रुम मेट बाद में बताए मैं सपने में भी समीकरण बडबड़ाती थी।अब मैं रसायन की व्याख्याता हूँ ।पिछले वर्ष रसायन में नवाचार के लिये राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उयके के द्वारा राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित भी हुई।
और अब समझ में आ गया है कि वाकई *परिश्रम का फल बहुत ही मीठा होता है ।*
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर,छग
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