स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा-आलेख
शीर्षक -"अहिंसा परम धर्म है"/"अहिंसा परमो धर्म:"
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आदि काल से ही जीवों की रक्षा का संदेश चला आ रहा है। चाहे वह किसी भी धर्म और जाति की बात हो । जीव को पीड़ा पहुंचाना कोई भी धर्म नहीं कहता ।सभी धर्म में जीवो और जीने दो की बात कही गयी है। सभी धर्म जीव को उनके अधिकार देने की बात करता है । उनके जीवन को यथासंभव निर्वाह करने की सुविधाएं प्रदान करने पर जोर देता है । यह अहिंसा पर चलकर ही संभव है ।
अहिंसा हमारे वैदिक सभ्यता की परंपरा को उजागर ही नहीं करता बल्कि इसे विश्व में प्रतिस्थापित कर इसे उच्च पद पर आसीन भी करता है ।अहिंसा ही वह रास्ता है जिस पर चलकर समाज उत्कृष्टता को प्राप्त कर सकता है ।
हिंसा करना सर्वथा अनुचित है चाहे वह शारीरिक या मानसिक हो ।वाणी से भी किसी को बुरा भला कहना हिंसा में ही आता है । किसी के मन को आघात करना, दुखी करना हिंसा का एक रूप है । हमारे ऋषि मुनियों ने कहा है कि अगर हम अपने मन में भी किसी के प्रति बुरी भावना या बुरा विचार लाते हैं तो वह भी हिंसा के अंतर्गत आता है , अर्थात हिंसा करने वाला व्यक्ति दूसरे जीव के प्रति अपने निकृष्ट व्यवहार एवं प्रवृति को दर्शाता है।
महात्मा गांधी जी ने अहिंसा को अपना हथियार बनाकर इसकी महत्ता को सर्व उजागर कर दिया। अहिंसा वह शक्ति है जिसके द्वारा बड़े से बड़े कार्य को लक्ष्य तक पहुंचाया जा सकता है । गांधी जी की सत्य के प्रति निष्ठा एवं अहिंसा ने 200 वर्ष राज्य कर चुके ब्रिटिशों को भगाने में अपनी अहम भूमिका ही नहीं निभाई बल्कि सैकड़ों वर्षो से सुप्त पड़ी हमारी भारतीय सनातन धर्म के नियमों को जागृत करने का भी काम किया था ।
आज की सीमा विस्तार परंपरा हिंसा को बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है । सत्य और अहिंसा की धारा से विमुख हो रहे आज को फिर से सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाने की आवश्यकता है ।इसके लिए पुनः नई पीढ़ी में गांधी ,शास्त्री,और विवेकानन्द सरीखे व्यक्तित्व को सामने आकर विश्व मानचित्र पर सत्य और अहिंसा की धारा बहाने की आवश्यकता आन पड़ी है । वरना वह दिन दूर नहीं जब यह विश्व हिंसा की मार्ग पर चल धराशायी हो जाएगा।
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