स्थान- जिला रायगढ़,छत्तीसगढ़
विधा- मुक्त
शीर्षक- पतझड़
*पतझड़*
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रोको सको तो रोक लो इस पतझड़ को,
खत्म कर देगी हरियाली, टूट जाएंगे बिखर जाएंगे धरा पर,
जिनके आगोश में हम सपने संजोया करते थे,
बातें करते थे ,
जुदा होते उस मंजर को कैसे देख पाओगे,
कैसे सह पाओगे वह दर्द, तुम भी टूट जाओगे,
रोक लो उस पतझड़ को।
रोक सको तो रोक लो इस पतझड़ को,
आती हुई बवंडर को उड़ा ले जायेगी,
जिनके एक झोंके तुम्हे सरगम का एहसास कराती थी,
खत्म हो जाएंगी बहारें,
टूट जाएंगे सपने,
जिनके छांव में देखा करते थे,
रुको मत जाने दो समेट लो आलिंगन में,
सजा लो सांसो में बसा लो, उड़ जाने से पहले,
बिरान सूखे पत्तों की चीख को नहीं सुन पाओगे,
जो निकलेंगे इसके जुदाई से,
दर्द से कांप जायेगी रूहें, उड़ जाने से पहले रोक लो पतझड़ को।
रोक सको तो रोक लो उस पतझड़ को,
बिरह बेदना में ना बहने दो, आंसुओं का समंदर होगा, तुम भी बह जाओगे,
डूब जाओगे मझधार में,
ना साहिल पर सुन सकेगा आवाज तुम्हारी,
उस अनंत गहराई में चले जाओगे,
जहां पतझड़ के पत्ते तैरती है।
रोक सको तो रोक लो उस पतझड़ को,
एक चिंगारी जला देगी, राख कर देगी सारी अस्त्तिव को,
दावानल बन तबाह कर देगी,
उस अग्नि की लपटें सब खत्म कर देगी,
एक सन्नाटा ना आहट होगी कोई,
एक एहसास ढूंढते रह जाओगे जो धड़क रही है।
रोक सको तो रोक लो उस पतझड़ को,
छोड़ो बसन्त की आस को,
बरखा की प्यास को,
इंतजार करते रह जाओगे,
टिमटिमाते तारों की तरह,
एक रोज आयेगी पतझड़ की आंधी,
उड़ा ले जायेगी सारे रंगत,
रह जायेंगे सिर्फ यादें,और यादों में तन्हाइयां,
रोक सको तो रोक लो इस पतझड़ को।
मौलिक रचना
अजय पटनायक
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