पता :- तमनार ,रायगढ़ (छत्तीसगढ़ )
वर्तमान पता :- सम्बलपुर ओड़िशा
विधा :- कविता (मुक्त छंद )
पालने में झूलें देव जिसकी वो नारी है |
सृजनकार वो जीवन जिसकी आभारी है |
सीता सी पावन , राधा सी सुकुमारी है |
हर माँ का गौरव है पिता की दुलारी है |
ममत्व भरा ह्रदय सूरत बड़ी प्यारी है |
त्याग तपस्या की मूरत है ,सम्मान अधिकारी है |
अबला नहीं सबला है न समझाना बेचारी है |
पालने में झूलें देव जिसकी वो नारी है |
जिद्द पे वो जाये तो आकाश झुका दे |
तीनों लोकों के स्वामी को बालक बना दे |
सती जब बने चंडी रूद्र पैरों तले
ला दे |
तिनके की नोक पे जो रावण को डरा दे |
सत्यवान के प्राण को जो यम से
छुड़ा दे |
रक्तबीज रक्त पीकर काली विकराल रूप दिखा दे |
लक्ष्मी बाई सी मर्दानी अंग्रेजों को
मात चखा दे |
क्रोध में न लाना ये विकराली है |
पालने में झूलें देव जिसकी वो नारी है |
जब जब नारी का अपमान हुआ है |
इतिहास गवाह संग्राम हुआ है |
कौरव बचे न उनका अंश फिर तुम्हे किस बात का अभिमान हुआ है |
लूटी नारी की जिसने भी अस्मिता अंत उसका समसान हुआ है |
जिसने नारी को समझा अबला
उसका ही नुकसान हुआ है |
जीवन जिसका तप समान राह न कभी आसान हुआ है |
वही प्रतिष्ठा पुरुषों की उन्ही के द्वारा फिर क्यों अपमान हुआ है |
प्रेम और आदर बस चाह उसकी जानें दुनिया सारी है |
पालने में झूलें देव जिसकी वो नारी है |
No comments:
Post a Comment