जिला :- महासमुन्द
विषय:- मोह
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक:- मोह
अलंकार :- तद्गुण अलंकार
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मानव मन में मोह है,
बस एक मायाजाल।
मोह में आकर सर पर लेते,
बेवजह सकल जंजाल।
मोह माया संसार में,
नद सी बहती जाए।
एक मिले तो मानव सोचे,
बस एक और मिल जाए।
मोह भाव प्रखर हुआ,
रवि किरण से तेज।
मीन से चंचल भाव हुए,
प्रतिपल बदले वेग।
मोह में आ सद्कर्म करें,
मोह से करे दुष्कर्म।
सकल जगत को पा लेना,
मानव माने निज धर्म।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने मानव मन में जागृत होने वाले मोह भाव का वर्णन किया है।
काव्य अलंकरण के लिए रचनाकार ने तद्गुण अलंकार के प्रयोग का प्रयास किया है।
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