Tuesday, October 6, 2020

गिरधारी लाल चौहान की रचना- मोह

नाम-गिरधारी लाल चौहान
स्थान-नवापाराखुर्द/सक्ति
जिला-जांजगीर चाम्पा,/ छत्तीसगढ
विषय -मोह
विधा-कविता (तदगुण अलंकार पर आधारित)
शीर्षक--मोह के अधीन

मोह के अधीन होकर मानव,भटक रहा संसार में ।
कभी जन का  कभी धन का,उलझा इस व्यापार में ।

सोच रहा लाभ ही लाभ ,हानि को कौन सोचे ।
लेकिन उपर में विधि बैठा,उसी से सब होते ।
किसी का कहां दखल पाओगे, उसके कारोबार में ।

गरीब सोचता धन आ जाये, आराम से जीवन कटे ।
दौलत वाला सोच रहा, मेरा दौलत कभी न घटे ।
कोई सफल न हो सका है, उसके इस संसार में ।

हरि वाले हरि के मद में,फूले नहीं समाते ।
गुण त्याग अवगुण ग्रहण से,वो भी है मिट जाते ।
सब कुछ यहां हरि की माया,उनकी कृपा जीत हार में ।

आग को भी तुच्छ समझे, तुच्छ समझे पानी ।
मोह से सदा दूर पाओगे,होते परम ज्ञानी ।
चाहे कुछ भी कर लो जीवन,न काम का उस दरबार में ।

व्याख्या-कवि के द्वारा मन में मोह के जाल वश मनुष्य भूल जाता है कि यह जीवन नाशवान है , कोई काम का नहीं है ।
वह अजर अमर मानकर चलता है और भटक जाता है अन्यों की तरह ही उसकी भी गति होती है, इससे हमको दूर रहना चाहिए कल्याण मार्ग ही उत्तम व्यापार है ।

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