जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
शीर्षक - " धरती माता "
विधा - छंदमुक्त कविता
अलंकार - एकावली अलंकार
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धरती सजी दुल्हन-सी,
दुल्हन की शोभा श्रृंगार है।
हरे भरे प्यारे पेड़-पौधे,
धरती माता की अलंकार है।।
कोमल-कोमल फूल सुंदर,
सुंदर-सी ये बहार है।
नदियों की ये चमकती धारा,
मानो गले का हार है।।
पर्वत पहाड़ पर बहता झरना,
कल-कल निरंतर बहती है।
झरने से निकलती सुमधुर ध्वनि,
धरती माता मानो हंसती है।।
पछी की चहचहाट से बढ़ती,
प्रकृति की मुस्कान है।
पशु धन,अमूल्य संपदा वन की,
बसती उनमें जान है।।
बहुत ही सुन्दर धरा हमारी,
धरती माता है बहुत महान।
मिलती हर सुख इनके गोद में,
करुँ माँ जैसा मैं इनका सम्मान।।
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एकावली अलंकार का प्रयोग -
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1. धरती सजी दुल्हन-सी,
दुल्हन की शोभा श्रृंगार है।
2. कोमल-कोमल फूल सुंदर,
सुंदर-सी ये बहार है।
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