स्थान- कचंदा
जिला- जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा- कविता
शीर्षक- जागृति
जागृति
धन देता मानव को असीमित सुख
फिर भी नहीं मिटती तृष्णा की भूख ।
तृष्णा की भूख , अधिकता की चाह।
सद्मार्ग को छोड़ अपनाता गलत राह ।
कह "प्रधान" कविराय, बेईमान मत बन।
सद्कर्म में ही लगा , अपना सारा धन।
अच्छे व्यक्ति बनो , रखो पवित्र विचार ।
सुखद करम करो , मत करो दुराचार।
मत करो दुराचार , बढ़ाओ अपना ज्ञान।
विवेक शुन्य न हो, रखो इसका ध्यान।
कह "प्रधान" कविराय, बनो मन के सच्चे ।
मान सदा ही पाओगे, कहलाओगे अच्छे ।
इंसान के भीतर है, शक्ति का खजाना ।
करो पहचान अपनी, न रहो अंजाना ।
न रहो अंजाना , जगाओ अपनी शक्ति ।
क्षमता जागृत हो , मिले निराशा से मुक्ति ।
कह "प्रधान" कविराय , हो आत्म उत्थान ।
कर कोई काम ऐसा , जागे सोया इंसान ।
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