जिला - बलौदा बाजार (छ. ग.)
विषय - मनुष्य
विधा - छंद मुक्त कविता
अलंकार - एकावली अलंकार
शीर्षक - मनुष्य की पहचान
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// मनुष्य की पहचान //
दो हाथ
दो पैर
एवं रंग बदलते चेहरे ,
क्या यही मनुष्य है ?
अथवा
जन्म से मरण तक
उदरपूर्ति की स्वार्थयुक्त
वासनाओं के पीछे भागते रहना ,
क्या इसी का नाम मनुष्य है ?
मेरा मन कहता है ,
नहीं ।
मनुष्य तो
प्रतीक है धर्म का ,
ऐसा धर्म जिसमे मानवीयता हो ,
मानवीयता जिसमे लहराता हो
प्रेम का सागर ,
प्रेम जिसमे सर्व कल्याण की
हो भावना ।
अन्यथा
मनुष्य और पशु में
अन्तर होगा केवल शरीर का ।
मनुष्य तो मननशील होता है ,
मन जो ज्ञान व बुद्धि से
परिपूर्ण हो ,
बुद्धि जिसमें
सच - झूठ और न्याय -अन्याय को
पृथक करनेवाली विवेकशक्ति हो ,
ऐसा विमल विवेक
जो
आत्मा और अनात्मा का
नीर - क्षीर विभेद कर दे ।
तभी तो सार्थक है
मनुष्य होना
और यही
घोड़ा , गधा , कुत्ता
से
पृथक होने की
या यूँ कहिये
मनुष्य होने की पहचान है ।
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एकावली अलंकार का प्रयोग -
1.मनुष्य तो
प्रतीक है धर्म का ,
ऐसा धर्म .....
2. मनुष्य तो मननशील होता है ,
मन जो ज्ञान.....
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