Saturday, October 3, 2020

लीलाधर कुम्हार की रचना- मनुष्य

रचनाकार - लीलाधर कुम्हार
जिला - बलौदा बाजार (छ. ग.)
विषय - मनुष्य
विधा - छंद मुक्त कविता
अलंकार - एकावली अलंकार
शीर्षक - मनुष्य की पहचान
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    //  मनुष्य की पहचान  //

दो हाथ
दो पैर
एवं रंग बदलते चेहरे ,
क्या यही मनुष्य है ?
अथवा
जन्म से मरण तक
उदरपूर्ति की स्वार्थयुक्त
वासनाओं के पीछे भागते रहना ,
क्या इसी का नाम मनुष्य है ? 
मेरा मन कहता है ,
नहीं ।
मनुष्य तो
प्रतीक है धर्म का ,
ऐसा धर्म जिसमे मानवीयता हो ,
मानवीयता जिसमे लहराता हो 
प्रेम का सागर ,
प्रेम जिसमे सर्व कल्याण की 
हो भावना ।
अन्यथा
मनुष्य और पशु में
अन्तर होगा केवल शरीर का ।
मनुष्य तो मननशील होता है ,
मन जो ज्ञान व बुद्धि से
परिपूर्ण हो ,
बुद्धि जिसमें 
सच - झूठ और न्याय -अन्याय को
पृथक करनेवाली विवेकशक्ति हो ,
ऐसा विमल विवेक 
जो
आत्मा और अनात्मा का
नीर - क्षीर विभेद कर दे ।
तभी तो सार्थक है
मनुष्य होना 
और यही
घोड़ा , गधा , कुत्ता
से 
पृथक होने की 
या यूँ  कहिये 
मनुष्य होने की पहचान है ।

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एकावली अलंकार का प्रयोग -
1.मनुष्य तो 
   प्रतीक है धर्म का ,
    ऐसा धर्म .....
2. मनुष्य तो मननशील होता है ,
    मन जो ज्ञान.....

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