पता- अमलोर,महासमुन्द (छ. ग.)
शीर्षक - मन
'मन'
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नहीं ठहरता एक जगह पर ,
सचमुच मन बंजारा हैं ।।
कहीं बहते तन्हाइ में तो,
बरसे मेघ आवारा हैं ।।
कभी पर्वत दिगार थंभ तो,
शत्रु को चट्टान बन ललकारा हैं।
ढाल मरु सा शांत प्यारा हैं।
घाँटी बन प्रतिबिम्ब निहारा हैं।।
धूप सहते ठूंठ बन कर
आते बंसत मतवारा हैं ।
छटा बिखेरे अमावस चाँद
करे तन शीतलता न्यारा हैं ।।
भ्रमर जैसे दर बदर बाग घूमे,
कभी कलियो पे बलिहारा हैं।
जग में नाव्या बीज जो सींचे
तन मोह मनन से किनारा हैं ।।
कलम के जैसे अथाह लिखते
ना सुस्ताये ना कभी थक हारा हैं
रोके रुके ना जीवन पथ का युद्ध
'अजय' चित चंचल मन हमारा हैं ।।
अजयशेखर नेताम 'नैऋत्य'
अमलोर (महासमुन्द)
Nice 👌👌
ReplyDelete👌👌👌
ReplyDeleteअति उत्तम
ReplyDeleteवाह्ह वाह क्या कहने आदरणीय श्री नेताम जी बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना मित्र बधाई 🙏🙏
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