रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवासी-बैरन-बाज़ार,रायपुर,छ.ग,।
जिला-रायपुर, छत्तीसगढ़ ।
विषय:-दर्शनिक ।
शीर्षक--"रिश्तों की टूटती माला " ।
विधा-छंद मुक्त कविता ।
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》•》||"रिश्तों की टूटती माला "||•••
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मुझे अच्छा लगता था---
परिवार की भीड़ में,रहने से--।
घर में,चहकते ,उछलते -कूदते--
बच्चों की किलकारियां,
सामूहिक भोजन करना,
बैठकर गपशप करना और--
समस्या,तनाव दूर करने की,
थी,दबे पाँव इक दवा--।
आज ,ना जाने क्यूँ--
रिश्तों की टूटती जा रही है माला ।
ना जाने क्यूँ---
मैं और हम में फर्क ,होने लगा है ।
जिस घर में पैदा हुआ--
उस घर की मिट्टी की खुशबू--
क्यों--बासी लगने लगी है ।
बूढ़े माँ-बाप की---
चेहरों की झुर्रियाँ और--
धीरे धीरे,लाठी टेककर चलना,
और अपनी बात को मनवाना,
अब हमें,कितना खटकने लगा है ।
कभी सास भी बहु थी--
पर,आज मैं भी एक बहु हूँ ,
रिश्तों को समझना--
मैं क्यों नहीं चाहती हूँ--?
मेरा बच्चा ,पर मेरा भतीजा --
मेरी नन्ंद के बोल में--
अब उतनी मिठास नहीं--?
क्या !हमारा जीवन 'डायबीटीस' की--
बीमारी की तरह---
क्यों--परहेज भरा हो गया है--?
मैं,भी अपने आप से--
प्रश्न करता हूँ कि--?
क्या 'अरमान 'तुम भी,बदल गये हो-?
और बदले बदले,नजर आते हो--
क्यों आज---
रिश्तों की टूटती जा रही है माला ।
क्या !नित नये खोजों ने,मनुष्य को--
कहीं--मशीन तो,नहीं बना दिया है-?
पर,वे तो बेज़ुबान-बेजान होती हैं,
वे तो,स्वयं 'गतिमान ',नहीं होते हैं-?
उनके चालक तो--
सिर्फ़ हम और तुम ही होते --।
भारत की तपोभूमि में---
सामाजिक अपनापन---
चिल्ला कर ,शंखनाद करने तक ,
क्यों--सिमटता जा रहा है--?
पर,मैं,अपने मन की बात---
आप में बाँटना चाहता हूँ--?
कुछ पेट को,खाली रखते हुए--
खाना सीखो,सुखी जीवन की थाली में
तुम--नेह बाँटना भी सीखो--
पर,पल दो पल,आराम करना भी-- सीखो,हर पक्ष के,दो पहलु होते हैं--
उस पर भी तुम,सोचना सीखो ।
जमाने में,हम सबकी--
तस्वीरें तो,खींच चुकी हैं,
पर ,उस तस्वीर में--
तुम,मुस्कुराना भी,तो सीखो--।
===== इति =========
*स्वरचित-प्रस्तुति *****
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