Monday, October 12, 2020

गरियाबंद से दुष्यंत कुमार वर्मा की रचना- समाज

रचनाकार - दुष्यंत कुमार वर्मा
स्थान-      राजिम परसदा 
 विधा -     मुक्तकविता
शीर्षक -"समाज में दो फाड़ नजर आता है" 

क्या हाल है, क्या ख्याल है
हो रहा, कैसा ये कमाल है
कैसी ये दकियानूसी सोच है
विचारों में जरुर खोट है
कल तक चलथे साथ मुट्ठी बांधे
तिनकों में बिखरा नजर आता है
समाज में दो फाड़ नजर आता है।

मानाकि चार आदमी चार सोच है
अपनी भाषा अपनी चोंच है
मगर  लोग स्वार्थों में लिपट रहे है
बस खुद तक सिमट रहे है
मोहरा वो बनाके,
चाल क्या-क्या चल रहे हैं
मुझे तो बस तेरी दुर्गति नजर आता है
समाज में दो फाड़ नजर आता है।।

बिखर रहा क्युं देश मेरा, लोगों का ये सवाल है
ओछी हरकत नीची सोच, का ये बवाल है
अरे देश दराज का क्या करूं
एक छोटा-सा गांव मेरा
छोटी-सी गली पे
छोटी सी बात पे, घमासान देखता हूँ
सत्ता के रौब में चुर वो कदरदान हूँ
झुठी शान पे अड़ी, वो मकान देखता हूँ
आपसी बैर में तपती, वो महान देखता हूँ
कैसी ये खिलाफत है
कैसा ये नजारा नजर आता है
समाज में दो फाड़ नजर आता है।।


            रचनाकार 
      दुष्यन्त कुमार वर्मा

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