पता :- तमनार ,रायगढ़ (छत्तीसगढ़ )
वर्तमान पता :- सम्बलपुर ओड़िशा
विधा :- कविता (मुक्त छंद )
शीर्षक :- धुप छाँव
कभी है धुप तो कभी ये छाँव है |
हर पल नया जिंदगी का बर्ताव है |
जख्म दे यही भरे यही घाव है |
रुकने का नाम नहीं ऐसी तेज बहाव है |
कभी है धुप तो कभी ये छाँव है |
कोई महलों में खेले ,तो कोई ठोकरों में पलता है |
कहीं नसीब पानी तक नहीं तो कहीं पानी सा जाम बहता है |
कोई तन सर्दी में तड़पे ,तो कोई मखमलों में लिपटा है |
कोई चले नंगे पग तो कोई
हवाओं में उड़ता है |
कैसी ये फितरत इसकी कैसा भेदभाव है |
कभी है धुप तो कभी ये छाँव है |
कोई लिपटा हैं माँ के आँचल से ,कोई दिल ममता को तरसता है |
कोई भीड़ में भी तनहा है तो कोई आँख अकेले बरसता है |
कहीं प्यार बिन सुना जीवन
तो कहीं प्यार ही प्यार सजता है |
रोटी जीवन से महँगी ,और खून
पानी से सस्ता है |
अलग हर फलक में ये कैसा
खुद से ही टकराव है |
कभी है धुप तो कभी ये छाँव है |
जो भी जैसी भी है हंस के बिताना है |
जीवन के मुश्किलों से पंजा लड़ना है |
आएं जब दुनिया में तो जीतकर बाजी बाजीगर कहलाना है |
आँखों में डाल आँखे गम को हँसना सीखाना है |
हर मोड़ हौसले से ,उम्मीदों से
रंगना हर पड़ाव है |
कभी है धुप तो कभी ये छावं है |
No comments:
Post a Comment