Monday, October 5, 2020

मनोरमा पटनायक की रचना- धुप- छाँव

रचनाकार :- मनोरमा पटनायक 
पता :- तमनार ,रायगढ़ (छत्तीसगढ़ )
वर्तमान पता :- सम्बलपुर ओड़िशा 
विधा  :- कविता (मुक्त छंद )
शीर्षक  :- धुप छाँव 


कभी है धुप तो कभी ये छाँव है |
हर पल नया जिंदगी का बर्ताव है |
जख्म दे यही भरे यही घाव है |
रुकने का नाम नहीं ऐसी तेज बहाव है |
कभी है धुप तो कभी ये छाँव है |

कोई महलों में खेले ,तो कोई ठोकरों में पलता है |
कहीं नसीब पानी  तक नहीं तो कहीं पानी सा जाम बहता है |
कोई तन सर्दी में तड़पे ,तो कोई मखमलों में लिपटा है |
कोई चले नंगे पग तो कोई 
हवाओं में उड़ता है |
कैसी ये फितरत इसकी कैसा भेदभाव है |
कभी है धुप तो कभी ये छाँव है |

कोई लिपटा हैं माँ के आँचल से ,कोई दिल ममता को तरसता है |
कोई भीड़ में भी तनहा है तो कोई आँख अकेले बरसता है |
कहीं प्यार बिन सुना जीवन 
तो कहीं प्यार ही प्यार सजता है |
रोटी जीवन से महँगी ,और खून 
पानी से सस्ता है |
अलग हर फलक में ये कैसा 
खुद से ही टकराव है |
कभी है धुप तो कभी ये छाँव है |

जो भी जैसी भी है हंस के बिताना है |
जीवन के मुश्किलों से पंजा लड़ना है |
आएं जब दुनिया में तो जीतकर बाजी बाजीगर कहलाना है |
आँखों में डाल आँखे गम को हँसना सीखाना है |
हर मोड़ हौसले से ,उम्मीदों से 
रंगना हर पड़ाव है |
कभी है धुप तो कभी ये छावं है |

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