स्थान-दुर्ग छ.ग.
विधा- मुक्त
विषय-परिवर्तन
शीर्षक- परिवर्तन और
सामंजस्य
प्रकृति का नियम
है परिवर्तन,
मौसम बदलते हैं,
दिवस का जाना फिर
रात्रि का आना,
निश्चित है,सब कुछ
नश्वर हैं हम भी,
बदलते रहेंगे लोग
और चलता रहेगा
परिवर्तन का दौर,
इतना सहज नहीं
स्वीकार लेना,हर मोड़ पर
गृहस्थ में, पेशे में,राजनीति
में, जीवन के हर पड़ाव
पल-पल बतलता मन ये ।
यौवन की आत्ममुग्धता
वयता की आहट को सदा
नजरअंदाज करती है,
फिर अवसाद का घेरा
घुटन पैदा करती है
बदलता है तन और
वृद्धावस्था की झुर्रियाँ
लाती है..
मानसिक अस्थिरता
नहीं है कुछ भी अटल
है कष्टमय..स्वीकारना
परिवर्तन संग सामंजस्य
स्वयं में अनुकुलन ।।
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