शहर/राज्य - कांकेर/छत्तीसगढ़
विधा - छंद मुक्त
शीर्षक - इंसानियत
धरती डोल रही
आकाश गरज रहा ।
इंसानियत का देखो
अब नहीं धीरज रहा ।।
मानवता शर्मसार हो चुकी
देखो करूणा ढिढक रही ।
इंसान की इंसानियत देख
धरम भी बिदक रही ।।
लोग ठहरे हाड़-मांस के
जी-ज़ान न रहा ।
इंसानियत का देखो
अब ईमान न रहा ।।
पुछ- परख क्या चीज है
कोई पहचान न रहा ।
इंसानियत लोगों का देख "पवन"
अब तक गुमनाम ही रहा।।
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