स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता (निदर्शना अलंकार का प्रयोग)
शीर्षक -"पितृपक्ष"
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जीवित तन को पानी तक न पूछा कभी
सोलह दिन तर्पण से गंगा नहाया करते हैं ।
माता पिता की सेवा की ही नहीं और
पितृदोष से बचने के उपाय किया करते हैं।
बुढ़ापे में मुँह का स्वाद न बदल सके
और नाना पकवान बनाया करते हैं ।
माता - पिता की बात न मानी कभी
और देवताओं को मनाया करते हैं ।
पोषण बिना शरीर जर्जर-सा हो गया
लोग आत्मा को बुला खिलाया करते हैं ।
नाना पकवान बनाते पितरों के लिए
और ब्राह्मणों का पेट भरा करते हैं।
दान उन्हें दो जिन्हें जरूरत हो इसकी
फिर पंडित की झोली ही क्यों भरा करते हैं ।
हमारे अपने थे आशीर्वाद सदा रहेगा उनका
फिर भी लोग ये ढोंग क्यों किया करते हैं ।
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