*जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)*
*शीर्षक - " भ्रमर "*
*विधा - छंदमुक्त कविता*
*अलंकार - उदाहरण अलंकार*
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फूलों की परागकण पर
चुंबन लेती जैसे भौरें।
मानो आलिंगन कर रही,
प्रियतमा को प्रेमी की बाहें।।
भ्रमर गीत गुंजन से,
मधुर लगता बागवान है।
मानो सरोद यंत्र की,
मनमोहन कोई तान है।।
भौरों के बिन फूल अधूरे,
भौरें भी कहाँ फूल बिना पूरे।
मिलन की जब बेला आती,
अद्वितीय सुंदरता प्रकृति ये तेरे।।
मंडराना अब तू बंद कर,
तनिक मुझमें विश्राम कर।
शहद-सी मीठी मेरा स्वाद,
इसका तू रसपान कर।।
मानव की प्रकृति भौरों-सा,
हर फूल में मन रमता है।
दिल लगाता हर कली से,
पर स्थिर कभी नहीं ठहरता है।।
जब तक रस का आनंद मिले,
तब तक रखता उसका मान है।
रसें जब सूख जाती उसकी,
छोड़ देता साथ इंसान है।।
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*उदाहरण अलंकार का प्रयोग* :-
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1. मानो आलिंगन कर रही,
प्रियतमा को प्रेमी की बाहें।
2. मानो सरोद यंत्र की,
मनमोहन कोई तान है।
3. मानव की प्रकृति भौरों-सा,
हर फूल में मन रमता है।
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Right👍👍👍
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