Monday, September 7, 2020

जांजगीर-चांपा से गिरधारी लाल चौहान की रचना- भ्रमर

नाम----गिरधारी लाल चौहान
स्थान-----नवापाराखुर्द/सक्ती
जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ

विधा- कविता (उदाहरण अलंकार पर आधारित )
शीर्षक -भ्रमर के गीत
व्याख्या--कवि के द्वारा  भ्रमर के गीत में पुष्पों के द्वारा भ्रमर के गीत सुनने के इच्छाओं एवं दशाओं का वर्णन किया गया है ।
************************************************                    भ्रमर के गीत
  भ्रमर के  गीत सुनने को, फूल आस में बैठे ।
जैसे कोई पथिक प्यासी, बहुत  प्यास में बैठे ।

नजर है उस ओर में, जहां चाहत दिखाई दे ।
चेहरे की छोड़िए बात, बहुत निराश में बैठे ।

मन कुछ और कहे, विकल है सारे अंग अंग ।
जितना जल्दी हमें मिले,इस प्रयास में बैठे ।

पेड़ों के पत्ते जब गिरे, लगे जैसे मिट  रहें हम ।
मरेंगे एक साथ सोच, एकदम आस-पास में बैठे ।

दुनियां को भूल चुके हैं, सिर्फ भ्रमर दिखाई दे ।
दशा लगे उनका हमें, जैसे कोई उपवास में बैठे ।

भ्रमर के तन श्याम से,इनका तन ज्यादा श्याम लगे ।
पूछने पर कहते हमें सभी, जैसे बनवास में बैठे ।

आंखों में अश्रु है बहुत,जो बह रहे अविरल ।
गिरते आंसुओं से लगता, जैसे आकाश में बैठे ।

हालात होता सबका एक सा, अगर प्यार की बात हो ।
सबको लगता रहता है, जैसे हम एक लाश में बैठे ।

भ्रमर जब तक न आये,सभी पूरे बेसुध से रहते  ।
जैसे कुछ कहे कुछ सुने, लगे दूर प्रवास में बैठे ।

जिनको जो मिलना होता, कुछ पल में मिल जाता है ।
क्या कहना उनका मित्रों, बड़े हर्ष उल्लास में बैठे ।

गिरधारी लाल चौहान

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