स्थान-----नवापाराखुर्द/सक्ती
जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा- कविता (उदाहरण अलंकार पर आधारित )
शीर्षक -भ्रमर के गीत
व्याख्या--कवि के द्वारा भ्रमर के गीत में पुष्पों के द्वारा भ्रमर के गीत सुनने के इच्छाओं एवं दशाओं का वर्णन किया गया है ।
************************************************ भ्रमर के गीत
भ्रमर के गीत सुनने को, फूल आस में बैठे ।
जैसे कोई पथिक प्यासी, बहुत प्यास में बैठे ।
नजर है उस ओर में, जहां चाहत दिखाई दे ।
चेहरे की छोड़िए बात, बहुत निराश में बैठे ।
मन कुछ और कहे, विकल है सारे अंग अंग ।
जितना जल्दी हमें मिले,इस प्रयास में बैठे ।
पेड़ों के पत्ते जब गिरे, लगे जैसे मिट रहें हम ।
मरेंगे एक साथ सोच, एकदम आस-पास में बैठे ।
दुनियां को भूल चुके हैं, सिर्फ भ्रमर दिखाई दे ।
दशा लगे उनका हमें, जैसे कोई उपवास में बैठे ।
भ्रमर के तन श्याम से,इनका तन ज्यादा श्याम लगे ।
पूछने पर कहते हमें सभी, जैसे बनवास में बैठे ।
आंखों में अश्रु है बहुत,जो बह रहे अविरल ।
गिरते आंसुओं से लगता, जैसे आकाश में बैठे ।
हालात होता सबका एक सा, अगर प्यार की बात हो ।
सबको लगता रहता है, जैसे हम एक लाश में बैठे ।
भ्रमर जब तक न आये,सभी पूरे बेसुध से रहते ।
जैसे कुछ कहे कुछ सुने, लगे दूर प्रवास में बैठे ।
जिनको जो मिलना होता, कुछ पल में मिल जाता है ।
क्या कहना उनका मित्रों, बड़े हर्ष उल्लास में बैठे ।
गिरधारी लाल चौहान
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