Monday, September 7, 2020

महासमुंद से विनोद कुमार "जोगी" की रचना- भ्रमर

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- भ्रमर
शीर्षक :- चंचल मन और भ्रमर
अलंकार :- उदाहरण अलंकार

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ज्यों चंचल भ्रमर भटके है,
भटके मानु का चंचल मन।
कभी अचनाक शिथिल हो जाते,
जैसे पड़ा हो राह में पाहन।
                फंस जाता है अक्सर भंवर में,
                मायावी संसार जाल में।
                जैसे भ्रमर बागबान में  फंसे है,
                पुष्प रूप के माया जाल में।
गुनगुनाता अपने धुन मैं,
नटखट अल्हड़ मानव मन।
जैसे भ्रमर के गुंजन से,
गूंज रहा है जग उपवन।
                 जन - मन अरु भ्रमर भी,
                 होते जगत में एक समान।
                 घूमते रहते यहां - वहां नित,
                 लिए हृदय में अनुपम अरमान।
सृष्टिकर्ता ने सृष्टि को,
मनमोहक बनाया रंग भरकर।
देख जिन्हें सम्मोहित हो,
चंचल मन और भ्रमर।

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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने जीवन में चंचल मन और भ्रमर ( भौंरों ) का वर्णन किया है।
काव्य अलंकरण के लिए रचनाकार ने उदाहरण अलंकार का प्रयोग किया है।

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