स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता (उदाहरण अलंकार का प्रयोग)
शीर्षक -"भ्रमर गुंजन "
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जैसे भ्रमर गुंजन महकाये कलियन को
वैसे कोयल की कूक सुहाये बसंत को
चांद बिन रास न आता चकोर को
मेघ बिन नृत्य न भावे मोर को
पतवार बिन पार न लगे नावँ को
ऐसे प्रिय बिन मन न लगे प्रेयसी को
जैसे भ्रमर गुंजन महकाये कलियन को
वैसे कोयल की कूक सुहाये बसंत को
इंद्रधनुषी रंग बिखरे अम्बर को
लहरें टकरा जाएं सागर के तट को
बादल बूंदें छलक छू जाती धरा को
ऐसे प्रिय की छुवन सिहराती तन को
जैसे भ्रमर गुंजन महकाये कलियन को
वैसे कोयल की कूक सुहाये बसंत को
स्वाति बिन चैन कहाँ चातक को
मधु बिन मधुप न मंडराए फूलों को
चांदनी बिन जग न भावे रात को
ऐसे प्रिय बिन जीव न मांगे ईश को
जैसे भ्रमर गुंजन महकाये कलियन को
वैसे कोयल की कूक सुहाये बसंत को
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